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"दिनों के बीच की खामोशी"
दिन के शोर और रात की चुप्पी के बीच,
कुछ पल ऐसे होते हैं जो किसी से कुछ नहीं कहते।
ना आवाज़ होती है, ना आहट,
बस एक ठहरा हुआ सन्नाटा,
जो दिल की दीवारों से टकरा कर
सवाल बन जाता है।
वो सवाल, जो उम्र के साथ गहराते हैं,
जिनका जवाब कोई किताब नहीं देती,
ना कोई रिश्ता, ना कोई दवा।
हम ढूंढते हैं खुद को
हर आईने में, हर चेहरे में,
कभी किसी अधूरे ख्वाब में,
कभी किसी बीते पल की परछाईं में।
प्रेम आता है — धीरे,
जैसे बरसात की पहली बूँद
सूखी ज़मीन पर गिरती है,
सांसें थम सी जाती हैं,
और फिर चल पड़ता है जीवन
एक नई उम्मीद के साथ।
पर प्रेम टिकता कहाँ है?
वो तो बदलता है रंगों की तरह,
कभी लाल, कभी फीका पीला,
और कभी-कभी बिल्कुल बेरंग।
फिर एक दिन हम समझते हैं,
कि जीना कोई कविता नहीं —
ये तो एक अधूरी किताब है,
जिसका हर पन्ना
अपने आप में एक कविता है।
हम चलते जाते हैं,
सवालों के साथ, यादों के बोझ के साथ,
और उस चुप्पी के साथ
जो हमें हर रोज़ कुछ नया सिखा जाती है।
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