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कविता शीर्षक: “रात की रागिनी”
धीरे-धीरे सरकती चाँदनी,
उसकी केशरंगी काया पर गिर रही थी,
मैं शब्दों में बाँध नहीं पा रहा था,
जो आँखों ने देखा, जो मन ने सहा।
वो आई थी जैसे रात्रि कोई अमृत से सजी हो,
उसकी आँखों में एक अजीब जादू था,
ना कामुकता कहो उसे, ना पूजा,
बस एक प्यास थी, जो बुझने से डरती थी।
उसके स्पर्श में जादू था या आग?
मैं जान नहीं पाया,
पर हर बार उसकी उँगलियों ने
मेरे वजूद को झकझोर दिया।
हम बातें नहीं करते थे ज़्यादा,
शब्द यहाँ बेमानी थे,
सिर्फ उसकी साँसें और मेरी धड़कनें
आपस में संवाद करती थीं।
कभी वो चुपचाप मेरे कंधे पर सर रख देती,
कभी उसकी हथेलियाँ मेरे सीने पर थमतीं,
और मैं उस मौन की भाषा को
हर बार नए अर्थ देता रहा।
रातें लंबी हो जाती थीं,
जब उसकी ज़ुल्फें मेरी उँगलियों में उलझ जातीं,
हर रात एक नई कविता बन जाती थी
हमारे नग्न सत्य के संग।
उसकी मुस्कुराहट जैसे मदिरा का पहला घूंट,
थोड़ी कड़वी, फिर मीठी,
और फिर लत बन जाए।
मैंने उसे कभी बाँधने की कोशिश नहीं की,
वो हवा थी, बहती रही,
पर हर बार लौटती उसी बिस्तर पर,
जहाँ हमारी आत्माएँ बिना कपड़ों के मिलती थीं।
ना कोई वादा था, ना कोई नाम,
हम एक-दूसरे के शरीर पढ़ते थे
जैसे पुरानी किताबें,
जिनमें खुशबू है, रहस्य है, और रस भी।
उसकी आवाज़ धीमी थी,
मगर जब वो मेरे कानों में कुछ कहती,
तो मेरी आत्मा तक कांप उठती।
“तुम मुझे वैसे देखते हो,
जैसे कोई काँच के पीछे आग देखे,”
उसने एक बार कहा था,
और मैं तबसे जल रहा हूँ।
कई बार मैं उसे सिर्फ़ छूना चाहता था
बिना कोई शब्द बोले,
और वो समझ जाती थी,
अपने होंठों से जवाब देती थी।
हम दोनों जानते थे,
ये प्रेम नहीं था शायद,
या शायद प्रेम की वो परत
जो सामाजिक परिभाषाओं से परे है।
वो और मैं —
दो प्यासे, दो अधूरे लोग,
जो एक-दूसरे में
अस्थायी संपूर्णता ढूँढते थे।
वो मेरे सीने पर सोती रही,
कई रातें ऐसे ही बीत गईं,
और हर बार उसके जाने के बाद
मैं तकिए से उसकी खुशबू चुराता रहा।
उसने मुझे कभी “अपना” नहीं कहा,
पर जब उसकी उंगलियाँ मेरी पीठ पर
नाम लिखती थीं,
तो वो सबसे गहरा अपनापन लगता।
उसकी देह एक कविता थी
जिसे मैंने सैकड़ों बार पढ़ा,
हर बार कुछ नया पाया,
हर बार कुछ खो दिया।
उसकी आँखों में जो अंधेरा था,
वो मुझे डराता नहीं था,
क्योंकि मैं भी एक ऐसा ही अंधेरा लेकर
उसके पास आता था।
हम एक-दूसरे की दरारों में समाते रहे,
जैसे पानी और मिट्टी,
जैसे रात और नींद,
जैसे अधूरी दुआ और पूरी ख्वाहिश।
रातें बदलती रहीं,
वो आती रही, जाती रही,
पर मेरे शब्दों में बसती रही,
मेरी कविताओं की आत्मा बन गई।
अब वो नहीं है,
पर उसकी परछाई
हर चादर में, हर तकिए में है,
और मेरी कलम में भी।
अब भी जब मैं लिखता हूँ,
तो उसकी साँसों की गर्मी
मेरे अक्षरों में घुल जाती है।
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