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"अनकही चाहतें"
चाँदनी रातों में जब सपने मर जाते हैं,
आँखों के किनारे कुछ जज़्बात उतर आते हैं।
शब्द नहीं बनते, बस साँसें चुप रहती हैं,
दिल की गहराइयों में कुछ ख्वाहिशें तड़पती हैं।
कहने को सब कुछ है, पर फिर भी अधूरा,
सपनों का हर तिनका बिखरा, टूटा, अधमूरा।
रात की चुप्पी में खुद से लड़ते हैं हम,
छोटे-छोटे जख्मों को बड़ी कहानियाँ बुनते हैं हम।
इश्क़ अब मासूम नहीं रहा,
जैसे शराब में घुला कोई कड़वा नशा।
छूते हैं जिस्म, पर रूह को कौन जानता है?
आँखों में चमक, पर दिल में कौन उतर पाता है?
तन्हाई अब दुश्मन नहीं, साथी बन गई,
बातें अब होंठों तक नहीं, साँसों में सिमट गईं।
भीड़ के बीच भी खुद को तन्हा पाया है,
हँसी के पर्दों में अक्सर दर्द छुपाया है।
हमने इश्क़ को किताबों में नहीं,
टूटे वादों की गलियों में जिया है।
हर ‘मैं भी’ के जवाब में एक ‘काश’ पाया है,
हर ‘तुम भी’ के पीछे एक ‘क्यों’ दबाया है।
जवानी की उन रातों में जब ख्वाब जले थे,
होठों पे अनकही बातें, आँखों में आँसू पले थे।
हर छुअन में कुछ अधूरी तलाश थी,
हर अलविदा में छुपी एक साजिश थी।
समय की चक्की ने रगड़ दिए सपनों के रंग,
अब आँखों में भी धुँधलापन सा है संग।
मगर फिर भी दिल एक मासूम बच्चे सा,
हर बार टूटकर भी प्यार करने चला जाता है।
कभी जिस्म की भूख को प्रेम समझ बैठे थे,
कभी इश्क़ को समझकर खुद को बेच बैठे थे।
अब समझ आया कि दिल जीतना कठिन है,
और जिस्म तो हर मोड़ पर बिक जाता है।
चौराहों पर खड़ी हैं हजारों कहानियाँ,
हर आँख एक समुंदर, हर मुस्कान एक विदाई।
उम्र के साथ-साथ चुप्पियाँ बढ़ती गईं,
और उम्मीदें कहीं धूल में खोती गईं।
जीवन के इस मोड़ पर जहाँ अब समझ आ रहा है,
कि मोहब्बत सिर्फ मिलना नहीं,
बल्कि खुद को खो देना भी है,
और कभी-कभी बिना छुए भी सबसे गहरा रिश्ता बन जाता है।
हमने इंतज़ार को भी प्रेम का हिस्सा बनाया,
अधूरी मुलाकातों में भी जिंदगी सजाई।
कभी चुप्पियों को बोलना सिखाया,
कभी आंसुओं को मुस्कान में छुपाया।
बड़ी अजीब बात है ना —
हम बड़े तो हो गए, पर दिल अब भी वही है।
टूटने के डर से नए रिश्ते नहीं बनाते,
और जो पुराने हैं, उनसे भी खुद को बचाते।
हसरतों के बाजार में खुद को खो दिया,
इच्छाओं की नीलामी में आत्मा को बो दिया।
अब जब ठहरते हैं तो सोचते हैं —
क्या हम सही थे, या बस वक्त के साथ बहते रहे?
रात के सन्नाटे में जब अपने ही सवाल करते हैं,
तो जवाब अक्सर मौन में मिलते हैं।
और समझ आता है कि परिपक्वता का अर्थ है,
खुश होने का नाटक करना, जब दिल रो रहा हो।
हर उम्र का अपना जूनून होता है,
पर जवानी का सच सबसे कड़वा होता है।
यह वह दौर है जब सपने बड़े होते हैं,
पर जेब खाली और दिल सबसे ज्यादा भरा होता है।
अब जब पलटकर देखते हैं,
तो कई मुस्कुराहटें याद आती हैं,
कई आँखें, कई वादे, कई धागे —
जिनमें से कुछ आज भी दिल के किसी कोने में सहेजे हुए हैं।
पर अब सीख गए हैं हम,
कि न हर मुस्कान प्यार होती है,
न हर साथ विश्वास होता है।
कभी-कभी, सबसे अच्छा साथ खुद का होता है।
तो अब जीते हैं खुद के लिए,
कभी किसी की परवाह किए बिना।
प्यार करते हैं बेशर्त खुद से,
और खुद को कभी अधूरा नहीं समझते।
क्योंकि अंत में, ज़िंदगी वही है —
जो अपने ही टूटे टुकड़ों को जोड़कर,
खुद को फिर से पूरा बना सके।
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