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"रूह की प्यास"
चाँदनी रातों में जब तनहाइयाँ मचलती हैं,
रूह के सूने गलियारों में कोई आहट सी चलती है।
हवाओं के साथ बहते जज़्बात,
तपती साँसों में उलझती यादों की बारात।
तेरे बदन की खुशबू अब भी इस हवा में घुलती है,
तेरी अंगुलियों की नरमी अब भी मेरी रूह को सहलाती है।
हर एक अधूरी मुलाकात, हर एक चुपचाप छुअन,
जैसे लहरों का टकराना तन्हा साहिल से —
हर बार अधूरा, हर बार प्यासा।
कभी तुम्हारे कंधे पर सिर रखकर,
सारे जहाँ की थकान मिटा देना चाहता था,
कभी तुम्हारी आँखों के समंदर में डूबकर,
सारी दुनियावी भीड़ से दूर खो जाना चाहता था।
तेरी मुस्कान की नर्म लौ में,
अपना पूरा वजूद जलाना चाहता था,
तेरी धड़कनों की लय में,
अपनी बेचैन साँसों को बाँध देना चाहता था।
पर ज़िंदगी के इस दौड़ते शहर में,
कहाँ मयस्सर होती है इतनी मोहलत?
जहाँ जिस्म तो मिलते हैं,
पर रूहें तन्हा ही रह जाती हैं।
अब तो छूने से भी डर लगता है,
कहीं फिर से अधूरा न रह जाऊँ,
कहीं फिर से कोई अधजली ख्वाहिश,
सीने के किसी कोने में न धधकने लगे।
तेरे बालों की खुशबू, तेरी गर्दन की गर्मी,
तेरे होंठों की नमी, तेरे कानों की सरगोशियाँ,
अब भी रातों को तड़पाती हैं,
अब भी यादों में भटकती हैं।
हर रात एक तन्हा पहर बन जाता है,
जहाँ शब्द नहीं होते, सिर्फ़ साँसों की सरगोशियाँ होती हैं।
जहाँ कोई कसक सी तैरती है,
तेरे नर्म छुअन की, तेरी बेख़बर मुस्कान की।
कभी-कभी तो लगता है,
इश्क़ सिर्फ़ जिस्म का भूखा नहीं होता,
इश्क़ रूह का भी एक बेबस भटकाव होता है,
जहाँ हर छुअन से, हर नज़र से,
अपना अस्तित्व ढूँढते हैं हम।
चाहत की एक अजीब सी प्यास है,
न प्यार भर पाता है, न जिस्म बुझा पाते हैं।
ये प्यास जो रूह में धँसी है,
कभी आँसुओं से बहती है, कभी मुस्कानों से छुप जाती है।
कभी तुम्हारे होंठों पर बिखर जाने का मन करता है,
कभी तुम्हारी पीठ पर अपने नाम की उँगलियों से कहानी लिखने का मन करता है,
कभी बस तुम्हारे काँधे पर सिर रखकर,
सांसों में सांसें घोलने का मन करता है।
मगर हर बार वक़्त आड़े आ जाता है,
हर बार फ़ासले दीवार बन जाते हैं।
हर बार हम अपने ही ख्वाबों को,
अधूरा छोड़कर लौट आते हैं।
तेरी आँखों में जो अनकहा प्यार था,
वो अब भी मेरी यादों की किताब में दर्ज है,
तेरे माथे की शिकन, तेरी गर्दन की थरथराहट,
सबकुछ मेरी नसों में आज भी साँस लेता है।
समय की रेत में दबे वो लम्हे,
कभी-कभी उँगलियों से फिसलते हैं,
और जब भी कोई मीठी हवा छू जाती है,
तेरी यादें फिर से जिन्दा हो उठती हैं।
कभी-कभी सोचता हूँ,
क्यों नहीं जी सके वो एक रात पूरी?
क्यों नहीं ढल सके एक-दूसरे के अंदर उस रात?
क्यों हर बार दिल के दरवाज़े पर ही लौट आते रहे?
शायद डर था — खोने का,
या शायद डर था — खुद को खो देने का।
या शायद ये दुनिया...
जिसकी जंजीरों में हमारी प्यास जकड़ी रह गई।
अब भी, जब आँखें बंद करता हूँ,
तो तेरा चेहरा सामने आ जाता है,
तेरी अंगुलियों की गर्मी, तेरे होठों की थरथराहट,
सब महसूस होती है, बस तू कहीं नहीं होती।
अब भी, रूह की प्यास बाकी है।
अब भी वो चुपके से सीने में सुलगती है।
अब भी रातों के सन्नाटे में,
तेरा नाम बिन आवाज़ के पुकारता हूँ।
हर धड़कन एक दुआ बन गई है,
हर साँस तेरा एहसास बन गई है।
और ये प्यास...
ये कभी बुझती नहीं,
बस रूह में गहरी उतरती जाती है।
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