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शीर्षक: "साँसों की सरगम"
तेरे स्पर्श की आहट जब
मेरे रोम-रोम को छूती है,
तो जैसे किसी सूनी धूप में
हल्की-सी बारिश गिरती है।
तेरी आँखों की गहराई में
डूब जाने को जी चाहता है,
शब्द कम पड़ जाते हैं यहाँ
कुछ कहने को जी चाहता है।
तेरे होंठों की मुस्कान
मेरी धड़कनों को तेज़ कर दे,
हर एक पल तुझमें खो जाने की
मुझमें आदत-सी भर दे।
तू जब पास होता है मेरे,
तो समय ठहर-सा जाता है,
तेरी सांसों की गर्मी से
मेरा मन भी पिघल जाता है।
शब्द नहीं, बस स्पर्श चले
तेरे और मेरे बीच,
बोलते हैं अंग-अंग
बिना भाषा, बिना रीत।
तेरा आलिंगन, वो सिहरन,
मुझे बाँधता है पलकों में,
मेरा तन-मन नाच उठे
तेरे प्रेम की हलचल में।
रातों के सन्नाटों में
तेरी सिसकी जैसे गूंजती है,
मेरे नाम की पुकार
तेरी हर साँस में तैरती है।
तेरा हर चुम्बन एक कविता
जिसे पढ़ती हूँ बंद आँखों से,
तेरा हर स्पर्श एक प्यास
जिसे बुझाती हूँ अपने स्वप्नों से।
तू जब मेरी ओर झुकता है
फिज़ा भी थम जाती है,
तेरी उँगलियाँ जब कमर से उतरें
रूह तक छू जाती हैं।
ना ये वासना मात्र है,
ना कोई क्षणिक इच्छा,
ये तो दो आत्माओं की
चिरकालिक मिलन की परिभाषा।
तेरी सांसें जब मेरी गर्दन से
टकराती हैं चुपके से,
तो लगता है जैसे खुदा
खुद फुसफुसा रहा हो रुख से।
तेरा बदन, मेरी ज़ुबान,
तेरी गंध, मेरी पहचान,
ये प्रेम नहीं, अग्नि है
जो हर बार जले बग़ैर राख बन जाए।
हम एक-दूसरे को वैसे नहीं छूते
जैसे दुनिया करती है प्यार,
हम तो अपनी परछाइयों को
भी एक-दूसरे में खोजते हैं बारम्बार।
तेरी आहें जब लिपटती हैं
मेरी चीखों से रात भर,
तो वो प्रेम नहीं,
कोई सृजन का गीत लगता है अमर।
ये मिलन मात्र शरीरों का नहीं,
ये मिलन है आत्माओं का,
जहाँ स्पर्शों से इतर
कुछ अधिक जुड़ता है राहों का।
तेरे जाने के बाद भी
तेरी खुशबू मुझमें रहती है,
तेरे ना होने पर भी
तेरी धड़कनें मुझमें बहती हैं।
मैं तुझसे अलग नहीं हूँ,
तू मुझमें कहीं गहरा समाया है,
जैसे चाँदनी में छुपा सूरज
या रात में कोई ख्वाब छाया है।
तू मेरा आदान है,
मैं तेरा संप्रेषण,
हम दोनों एक कथा हैं
जो चलती हैं बस एक स्पंदन।
तेरी हर करवट की सिहरन
मेरे भीतर तक घुस जाती है,
तेरे मौन का शोर
मेरी चेतना तक हिलाता है।
कभी तेरी उंगलियाँ
मेरे बालों में उलझ जाएँ,
तो वो उलझन नहीं
कोई रागिनी सी बह जाए।
तेरी पीठ पर पड़ी मेरी हथेली
जब अपने निशान छोड़ जाती है,
तो उन निशानों में
तेरे सपनों की राह बन जाती है।
हम जब थककर लिपटते हैं,
तो जैसे सृष्टि को विश्राम मिलता है,
उस एक साँझ में
हर युग का संगम खिलता है।
तेरे बग़ैर सब अधूरा है,
तेरे साथ सब पूरा है,
ये प्रेम है, सम्भोग नहीं
ये समर्पण की धारा है।
तेरा होना, मेरा खोना
एक ही घटना की व्याख्या है,
जिसमें तू भी मैं है,
और मैं भी तू ही हूँ।
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