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"अनकही ख्वाहिशें"
छू लिया था तूने,
एक पल में मेरी रूह को,
वो छुअन सिर्फ़ बदन की नहीं थी,
कुछ गहरे तक उतर गई थी वो बात।
तेरी आँखों की झील में,
जब मैंने खुद को डूबते देखा,
समझा, ये सिर्फ़ प्रेम नहीं था,
ये एक अतृप्त चाह की पुकार थी।
शब्दों के परे,
सांसों के संग बहते जज़्बात,
तेरी उँगलियाँ जब मेरी हथेली को छूती,
वो कंपन सीने तक जाकर कुछ कहती।
रात की चुप्पी में,
तेरे नाम की गूंज थी,
तकिए पर रखी वो बिखरी जुल्फ़ें,
अब भी मेरे ख्वाबों में उलझी रहती हैं।
तेरा जिस्म मेरे ख़्यालों में
हर रोज़ नया रूप लेता है,
कभी तपता सूरज,
तो कभी ठंडी बारिश सी राहत।
तेरे होठों की प्यास
अब मेरी आत्मा में बस चुकी है,
उनकी गर्माहट का स्वाद
हर रात मेरी नींदों को चुराता है।
ये रिश्ता कोई आम नहीं,
न शादी के बंधन में बंधा,
न समाज की मोहर लगी है,
फिर भी ये सबसे सच्चा, सबसे गहरा लगता है।
तेरे साथ बिताए पल,
न शर्म के हैं, न पश्चाताप के,
वो बेधड़क चाहतें थीं,
जो आत्मा तक भिगो गईं।
तेरा स्पर्श कोई पाप नहीं,
वो तो इबादत का हिस्सा बन गया है,
हर बार जब तू पास आया,
मैंने खुद को और बेहतर जाना।
तेरे सीने पर सिर रखकर,
दुनिया की सारी थकान भूल गई,
वहाँ धड़कनों की आवाज़ में
मेरे नाम का सुर छुपा मिला।
हमने किताबों में नहीं,
एक-दूसरे की सांसों में कविता पढ़ी,
तेरी उँगलियों ने मेरी पीठ पर
वो शेर लिखे जो कभी मिटते नहीं।
ये इश्क़ उम्र की नहीं सुनता,
ना नियम, ना रीति, ना कायदा,
ये तो बस बहता है
जैसे नदी अपनी मरज़ी से दिशा चुन ले।
हम दोनों ने अपने जज़्बातों को
रातों की चांदनी में पिरोया,
हर चुप्पी में बात की,
हर मौन में इकरार था।
तेरी आदत हो गई है अब,
जैसे सुबह की पहली किरण,
जिसे देखे बिना
दिन का आगाज़ अधूरा लगता है।
तेरे कंधों की वो गर्मी
अब मेरी सबसे बड़ी जरूरत है,
जहाँ मैं अपने दर्द, अपने सपने
बिना कहे रख आती हूँ।
कभी तेरी बाँहों का घेरा
दुनिया की सबसे सुरक्षित जगह लगता है,
जहाँ डर, संकोच, दुःख – सब
पिघल जाते हैं।
हमने जिस्मों की भाषा में
दिल की बातें कही हैं,
तेरे लबों ने मेरे खामोशी को
नाम दे दिया।
ना कोई वादा था,
ना कोई कसमें,
फिर भी इस रिश्ते में
सबसे ज़्यादा भरोसा है।
तेरी हर छुअन
मुझे मेरी पहचान से जोड़ती है,
तू सिर्फ़ प्रेमी नहीं,
मेरे अंतर्मन का साथी बन गया है।
इस बंधन को शब्द देना
संभव नहीं,
यह तो एक साक्षात अनुभव है,
जिसे जीकर ही समझा जा सकता है।
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